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अपठित पद्यांश अभ्यास

अभ्यास प्रश्न 1

हँस लो दो क्षण खुशी मिली गर

वरना जीवन-भर क्रदन है।

किसका जीवन हँसी-खुशी में

इस दुनिया में रहकर बीता?

सदा सर्वदा संघर्षों को

इस दुनिया में किसने जीता?

खिलता फूल म्लान हो जाता

हँसता-रोता चमन-चमन है।

कितने रोज चमकते तारे

दूर तलक धरती की गाथा

मौन मुखर कहता कण-कण है।

यदि तुमको सामध्य मिला तो

मुसकाओं सबके संग जाकर।

कितने रह-रह गिर जाते हैं,

हँसता शशि भी छिप जाता है,

जब सावन घन घिर आते हैं।

उगता-ढलता रहता सूरज

जिसका साक्षी नील गगन है।

आसमान को छुने वाली,

वे ऊँची-ऊँची मीनारें।

मिट्टी में मिल जाती हैं वे

छिन जाते हैं सभी सहारे।

यदि तुमको मुसकान मिली तो

थामो सबको हाथ बढ़ाकर।

झाँको अपने मन-दर्पण में

प्रतिबिंबित सबका आनन है।


प्रश्न

(क) कवि दो क्षण के लिए मिली खुशी पर हँसने के लिए क्यों कह रहा है?

(ख) कविता में संसार की किस वास्तविकता को प्रस्तुत किया गया है?

(ग) धरती का कण-कण कौन-सी गाथा सुनाता रहा है?

(घ) भाव स्पष्ट कीजिए-

झाँको अपने मन दर्पण में

प्रतिबिंबित सबका आनन है।

(ङ) उगता डलता रहता सूरज के माध्यम से कवि ने क्या कहना चाहा है?

अभ्यास प्रश्न 2

क्या रोकेंगे प्रलय मेघ ये, क्या विद्युत-धन के नर्तन,

मुझे न साथी रोक सकेंगे, सागर के गर्जन-तर्जन।

मैं अविराम पथिक अलबेला रुके न मेरे कभी चरण,

शूलों के बदले फूलों का किया न मैंने मित्र चयन।

मैं विपदाओं में मुसकाता नव आशा के दीप लिए

फिर मुझको क्या रोक सकेंगे जीवन के उत्थान-पतन,

मैं अटका कब, कब विचलित में, सतत डगर मेरी संबल

रोक सकी पगले कब मुझको यह युग की प्राचीर निबल

आँधी हो, ओले-वर्षा हों, राह सुपरिचित है मेरी,

फिर मुझको क्या डरा सकेंगे ये जग के खंडन-मंडन।

मुझे डरा पाए कब अंधड़, ज्वालामुखियों के कंपन,

मुझे पथिक कब रोक सके हैं अग्निशिखाओं के नर्तन।

मैं बढ़ता अविराम निरंतर तन-मन में उन्माद लिए,

फिर मुझको क्या डरा सकेंगे, ये बादल-विद्युत नर्तन।


प्रश्न

(क) उपर्युक्त काव्यांश के आधार पर कवि के स्वभाव की किन्हीं दो प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

(ख) कविता में आए मेघ, विदयुत, सागर की गर्जना और ज्वालामुखी किनके प्रतीक हैं? कवि ने उनका संयोजन यहाँ क्यों किया है?

(ग) शूलों के बदले फूलों का किया न मैंने कभी चयन-पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।

(घ) 'युग की प्राचीर' से क्या तात्पर्य है? उसे कमजोर क्यों बताया गया है?

(ड) किन पंक्तियों का आशय है कि तन मन में दृढनिश्चय का नशा हो तो जीवन मार्ग में बढ़ते रहने से कोई नहीं रोक सकता?

अभ्यास प्रश्न 3

यह मजदूर, जो जेठ मास के इस निर्धूम अनल में

कर्ममग्न है अविकल दग्ध हुआ पल-पल में,

यह मजूर, जिसके अंर्गों पर लिपटी एक लँगोटी,

यह मजूर, जर्जर कुटिया में जिसकी वसुधा छोटी,

किस तप में तल्लीन यहाँ है भूख-प्यास को जीते,

किस कठोर साधन में इसके युग के युग हैं बीते।

कितने महा महाधिप आए. हुए विलीन क्षितिज में,

नहीं दृष्टि तक डाली इसने, निर्विकार यह निज में।

यह अविकंप न जाने कितने घुट पिए हैं विष के,

आज इसे देखा जब मैंने बात नहीं की इससे।

अब ऐसा लगता है, इसके तप से विश्व विकल है,

नया इंद्रपद इसके हित ही निश्चित है निस्संशय।


प्रश्न

(क) जेठ के महीने में अपने काम में लगा हुआ मजदूर क्या अनुभव कर रहा है?

(ख) उसकी दीन-हीन दशा को कवि ने किस तरह प्रस्तुत किया है?

(ग) उसका पूरा जीवन कैसे बीता है? उसने बड़े से बड़े लोगों को भी अपना कष्ट क्यों नहीं बताया?

(घ) उसने जीवन को कैसे जिया है? उसकी दशा को देखकर कवि को किस बात का आभास होने लगा है?

(ङ) आशय स्पष्ट कीजिए 'नया इंद्रपद इसके हित ही निश्चित है निस्संशय।


नीलांबर परिधान हरित पट पर सुंदर हैं,

सूर्य चंद्र युग-मुकुट, मेखला रत्नाकर हैं,

नदियाँ प्रेम-प्रवाह, फूल तारे मंडल है,

बंदीजन खग-वृद, शेषफन सिंहासन है

परमहंस सम बाल्यकाल में सब, सुख पाए,

जिसके कारण धूल भरे हीरे कहलाए,

हम खेले कूदे हर्षयुत, जिसकी प्यारी गोद में

हे मातृभूमि तुझको निरख, मग्न क्यों न हो मोद में

निर्मल तेरा नीर अमृत के सम उत्तम है,

शीतल मंद सुगंध पवन हर लेता श्रम है,

षट्ऋतुओं का विविध दृश्य युत अद्भुत क्रम है,

हरियाली का फर्स नहीं मखमल से कम है,

करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस वेश की

हे मातृभूमि! तू सत्य ही, सगुण मूर्ति सर्वेश की,

जिसकी रज में लोट लोटकर बड़े हुए हैं,

घुटनों के बल सरक सरक कर खड़े हुए हैं.

शुचि-सुधा सींचता रात में तुझ पर चंद्रप्रकाश है

हे मातृभूमि! दिन में तरणि करता तम का नाश है

जिस पृथ्वी में मिले हमारे पूर्वज प्यारे,

उससे हे भगवान कभी हम रहें न न्यारे,

लोट-लोट कर वहीं हृदय को शांत करेंगे

उसमें मिलते समय मृत्यु से नहीं डरेंगे,

उस मातृभूमि की धूल में, जब पूरे सन जाएँगे

होकर भव बंधन मुक्त हम, आत्मरूप बन जाएँगे।


प्रश्न

(क) प्रस्तुत काव्यांश में हरित पट किसे कहा गया है।

(ख) कवि अपने देश पर क्यों बलिहारी जाता है?

(ग) कवि अपनी मातृभूमि के जल और वायु की क्या क्या विशेषता बताता है?

(घ) मातृभूमि को ईश्वर का साकार रूप किस आधार पर बताया गया है?

(ङ) प्रस्तुत कविता का मूल भाव अपने शब्दों में लिखिए।

अभ्यास प्रश्न 4

मुक्त करो नारी को, मानव।

चिर बदिनि नारी को,

युग-युग की बर्बर कारा से

जननि, सखी, प्यारी को!

छिन्न करो सब स्वर्ण-पाश

उसके कोमल तन-मन के

वे आभूषण नहीं, दाम

उसके बंदी जीवन के

उसे मानवी का गौरव दे

पूर्ण सत्व दो नूतन,उसका मुख जग का प्रकाश हो,

उठे अंध अवगुंठन।

मुक्त करो जीवन-संगिनि को,

जननि देवि को आदूत

जगजीवन में मानव के संग,

हो मानवी प्रतिष्ठित!

प्रेम स्वर्ग हो धरा, मधुर

नारी महिमा से मंडित.

नारी-मुख की नव किरणों से

युग-प्रभाव हो ज्योतित!


प्रश्न

(क) कवि नारी के आभूषणों को उसके अलंकरण के साधन न मानकर उन्हें किन रूपों में देख रहा है।

(ख) वह नारी को किन दो गरिमाओं से मंडित करा रहा है और क्या कामना कर रहा है?

(ग) वह मुक्त नारी को किन-किन रूपों में प्रतिष्ठित करना चाहता है?

(घ) आशय स्पष्ट कीजिए-

नारी मुख की नव किरणों से

युग प्रभात हो ज्योतितः


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