भगत सिंह का साहित्यिक पक्ष

‘नयी भोर ले आऊँगा ढल कर भी मैं, जिंदादिल तुझको बनाऊंगा मरकर भी मैं

मैं मरूँगा तो दुनिया में जिंदगी के लिए, सबको मर मिटना सिखा जाऊंगा मर कर भी मैं

ये न समझना कि भगत को फाँसी पर लटकाया गया, सैकड़ों भगत बना जाऊंगा गुज़र कर भी मैं’


आज अधिकतर लोग भगत सिंह को इनकी शहादत के लिए ही याद करते हैं l युवा का वास्तविक पर्याय उपस्थित करता इस युवक के जन्म दिन पर उनके जीवन के कई पक्षों से आज हम परिचित हो रहे हैंl मैं उनके साहित्यिक पक्ष को उजागर करना चाहूँगी:-


पंद्रह-सोलह साल की उम्र में नेशनल कॉलेज लाहौर में पढ़ते हुए वे देश को आज़ादी कैसे मिले, इस पर अपने शिक्षकों और सहपाठियों से चर्चा किया करते थे। जितनी अच्छी हिन्दी और उर्दू, उतनी ही अंगरेज़ी और पंजाबी। इसी कच्ची आयु में भगत सिंह ने पंजाब में उठे भाषा विवाद पर झकझोरने वाला लेख लिखा। लेख पर हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने पचास रूपए का इनाम दिया। भगत सिंह की शहादत के बाद 28 फ़रवरी, 1933 को हिंदी संदेश में यह लेख प्रकाशित हुआ था। लेख की भाषा और विचारों का प्रवाह अदभुत है। इस लेख का एक अंश सुनिए - “इस समय पंजाब में उर्दू का ज़ोर है। अदालतों की भाषा भी यही है। यह सब ठीक है परन्तु हमारे सामने इस समय मुख्य प्रश्न भारत को एक राष्ट्र बनाना है। एक राष्ट्र बनाने के लिए एक भाषा होना आवश्यक है परन्तु यह एकदम नहीं हो सकता। उसके लिए क़दम क़दम चलना पड़ता है। यदि हम अभी भारत की एक भाषा नहीं बना सकते तो कम से कम लिपि तो एक बना देना चाहिए। उर्दू लिपि सर्वांग -संपूर्ण नहीं है। फिर सबसे बड़ी बात तो यह है कि उसका आधार फारसी पर है। उर्दू कवियों की उड़ान चाहे वो हिन्दी( भारतीय ) ही क्यों न हों -ईरान के साक़ी और अरब के खजूरों तक जा पहुँचती है। क़ाज़ी नज़र-उल-इस्लाम की कविता में तो धूरजटी, विश्वामित्र और दुर्वासा की चर्चा बार बार है, लेकिन हमारे उर्दू, हिंदी, पंजाबी कवि उस ओर ध्यान तक न दे सके। क्या यह दुःख की बात नहीं? इसका मुख्य कारण भारतीयता और भारतीय साहित्य से उनकी अनभिज्ञता है। उनमें भारतीयता आ ही नहीं पाती, तो फिर उनके रचे गए साहित्य से हम कहाँ तक भारतीय बन सकते हैं?…तो उर्दू अपूर्ण है और जब हमारे सामने वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित सर्वांग-संपूर्ण हिंदी लिपि विधमान है, फिर उसे अपनाने में हिचक क्यों? हिंदी के पक्षधर सज्जनों से हम कहेंगे कि हिंदी भाषा ही अंत में एक दिन भारत की भाषा बनेगी, परंतु पहले से ही उसका प्रचार करने से बहुत सुविधा होगी।


आज हिंदी पखवाड़ा के अंतिम दिन हम इस बात को आज के सन्दर्भ में भी देख सकते हैं, जहाँ हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की चिंता हैl यह चिंतन बरसों पूर्व सोलह-सत्रह बरस के भगत सिंह की चिंतन में था l इस भाषा पर आप क्या टिप्पणी करेंगे? इतनी सरल और कमाल के संप्रेषण वाली भाषा भगत सिंह ने लगभग 100 साल पहले लिखी थी। शिक्षक के रूप में विद्यार्थियों में इसी सामाजिक और तार्किक चिंतन की कल्पना हम करते है l लेकिन सोलह-सत्रह की उम्र में यह मौलिकता और सोच विकसित नहीं कर पाते। इसका एक कारण है उपयुक्त साहित्य न पढ़ पाना l इस उम्र तक भगत सिंह विवेकानंद, गुरुनानक, दयानंद सरस्वती, रवींद्रनाथ ठाकुर और स्वामी रामतीर्थ जैसे अनेक भारतीय विद्वानों का एक-एक शब्द घोंट कर पी चुके थे। यही नहीं विदेशी लेखकों-दार्शनिकों और व्यवस्था बदलने वाले महापुरुषों में गैरीबाल्डी और मैजिनी, कार्ल मार्क्स, क्रोपाटकिन, बाकुनिन और डेनब्रीन तक भगत सिंह की आँखों के साथ अपना सफ़र तय कर चुके थे।

उमर के इसी पड़ाव पर परंपरा के मुताबिक़ परिवार ने उनका ब्याह रचाना चाहा तो पिता जी को एक चिठ्ठी लिखकर घर छोड़ दिया।



सोलह साल के भगत सिंह ने लिखा,


पूज्य पिता जी,

नमस्ते!

मेरी ज़िंदगी भारत की आज़ादी के महान संकल्प के लिए दान कर दी गई है। इसलिए मेरी ज़िंदगी में आराम और सांसारिक सुखों का कोई आकर्षण नहीं है। आपको याद होगा कि जब मैं बहुत छोटा था, तो बापू जी (दादाजी) ने मेरे जनेऊ संस्कार के समय ऐलान किया था कि मुझे वतन की सेवा के लिए वक़्फ़ (दान) कर दिया गया है। लिहाज़ा मैं उस समय की उनकी प्रतिज्ञा पूरी कर रहा हूँ। उम्मीद है आप मुझे माफ़ कर देंगे

आपका ताबेदार

भगतसिंह



महान देशभक्त पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी से उनके संपर्क ने उनकी पत्रिकारिता को ऊंचाई दीl प्रताप पत्र में भगत सिंह बलवंत सिंह के नाम से लिखा करते थे। उनके विचारोतेजक लेख प्रताप में छपते और उन्हें पढ़कर लोगों के दिलो दिमाग में क्रांति की चिनगारी फड़कने लगती। उन्हीं दिनों कलकत्ते से साप्ताहिक मतवाला निकलता था। मतवाला में लिखे उनके दो लेख बेहद चर्चित हुए। एक का शीर्षक था- प्रताप में काम करते हुए उन्होंने महान क्रांतिकारी शचिन्द्रनाथ सान्याल की आत्मकथा बंदी जीवन का पंजाबी में अनुवाद किया। इस अनुवाद ने पंजाब में देश भक्ति की एक नई लहर पैदा की। इसके बाद आयरिश क्रांतिकारी डेन ब्रीन की आत्मकथा का अँगरेजी से हिंदी अनुवाद किया। प्रताप में यह अनुवाद आयरिश स्वतंत्रता संग्राम शीर्षक से प्रकाशित हुआ। इस अनुवाद ने भी देश में चल रहे आज़ादी के आंदोलन को एक वैचारिक मोड़ दिया।


दैनिक वीर अर्जुन में नौकरी शुरू कर दी। जल्द ही एक तेज तर्रार रिपोर्टर और विचारोतेजक लेखक के रूप में उनकी ख्याति फैल गई।


इसके अलावा भगत सिंह पंजाबी पत्रिका किरती के लिए भी रिपोर्टिंग और लेखन कर रहे थे। किरती में वे विद्रोही के नाम से लिखते थे। दिल्ली से ही प्रकाशित पत्रिका महारथी में भी वो लगातार लिख रहे थे। विद्यार्थी जी से नियमित संपर्क बना हुआ था। इस कारण प्रताप में भी वो नियमित लेखन कर रहे थे। पंद्रह मार्च 1926 को प्रताप में उनका झन्नाटेदार आलेख प्रकाशित हुआ। एक पंजाबी युवक के नाम से लिखे गए इस आलेख का शीर्षक था- भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का परिचय और उपशीर्षक था- होली के दिन रक्त के

काकोरी केस के सेनानियों को भगत सिंह ने सलामी देते हुए एक लेख लिखा। विद्रोही के नाम से। इसमें वो लिखते हैं “हम लोग आह भरकर समझ लेते हैं कि हमारा फ़र्ज पूरा हो गया। हमें आग नहीं लगती। हम तड़प नहीं उठते। हम इतने मुर्दा हो गए हैं। आज वे भूख हड़ताल कर रहे हैं। तड़प रहे हैं। हम चुपचाप तमाशा देख रहे हैं। ईश्वर उन्हें बल और शक्ति दे कि वे वीरता से अपने दिन पूरे करें और उन वीरों के बलिदान रंग लाएँ। जनवरी 1928 में लिखा गया यह आलेख किरती में छपा था। इन दो तीन सालों में भगत सिंह ने लिखा और खूब लिखा। अपनी पत्रकारिता के ज़रिए वो लोगों के दिलोदिमाग पर छा गए। फ़रवरी 1928 में उन्होंने कूका विद्रोह पर दो हिस्सों में एक लेख लिखा। यह लेख उन्होंने बी एस संधु के नाम से लिखा था। इसमें भगत सिंह ने ब्यौरा दिया था कि किस तरह छियासठ कूका विद्रोहियों को तोप के मुंह से बाँध कर उड़ा दिया गया था। इसके भाग-दो में उनके लेख का शीर्षक था -युग पलटने वाला अग्निकुंड। मार्च से अक्टूबर 1928 तक किरती में ही उन्होंने एक धारावाहिक श्रृंखला लिखी। शीर्षक था आज़ादी की भेंट शहादतें। इसमें भगतसिंह ने बलिदानी क्रांतिकारियों की गाथाएँ लिखीं थी। इनमें एक लेख मदनलाल धींगरा पर भी था। इसमें भगतसिंह के शब्दों का कमाल देखिए-“फाँसी के तख़्ते पर खड़े मदन से पूछा जाता है- कुछ कहना चाहते हो? उत्तर मिलता है- वन्दे मातरम! भगतसिंह की पत्रकारिता का यह स्वर्णकाल था। उनके लेख और रिपोर्ताज़ हिन्दुस्तान भर में उनकी कलम का डंका बजा रहे थे। वो जेल भी गए तो वहां से उन्होंने लेखों की झड़ी लगा दी। लाहौर के साप्ताहिक वन्देमातरम में उनका एक लेख पंजाब का पहला उभार प्रकाशित हुआ। यह जेल में ही लिखा गया था। यह उर्दू में लिखा गया था। इसी तरह किरती में तीन लेखों की लेखमाला अराजकतावाद प्रकाशित हुई। इस लेखमाला ने देश के व्यवस्था चिंतकों के सोच पर हमला बोला। उनीस सौ अट्ठाइस में तो भगत सिंह की कलम का जादू लोगों के सर चढ़ कर बोला। ज़रा उनके लेखों के शीर्षक देखिए- धर्म और हमारा स्वतंत्रता संग्राम, साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज, सत्याग्रह और हड़तालें, विद्यार्थी और राजनीति, मैं नास्तिक क्यों हूँ, नए नेताओं के अलग अलग विचार और अछूत का सवाल जैसे रिपोर्ताज़ आज भी प्रासंगिक हैं। इन दिनों दलितों की समस्याएं और धर्मांतरण के मुद्दे देश में गरमाए हुए हैं लेकिन देखिए भगत सिंह ने 87 साल पहले इस मसले पर लिखा था l उनका मानना था कि व्यक्तियों की हत्या करना सरल है, लेकिन विचारों की हत्या नहीं की जा सकतीl


आज उन्हें याद करने का मकसद है कि यह साहित्यिक उत्कर्ष यह चिंतन प्रसारित हो l यह उत्कृष्टता समाज में दिखे और हम और हमारी भावी पीढ़ी इस के प्रति श्रद्धानत होकर अपनी विरासत समझे और साथ ही अपने दायित्व का बोध भी कर सकेl


डॉ० निरुपमा कुमारी,

शिक्षिका, राम रूद्र +2 उच्च विद्यालय चास, बोकारो


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