बिरसा मुंडा- जड़, जंगल, ज़मीन की संघर्ष गाथा


बिरसा मुंडा भारत के एक आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी और लोक नायक थे l अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम में उनकी ख्याति और मात्र 25 वर्षों में उनके द्वारा किए गए कार्य के कारण यह भूमि सदा उनकी ऋणी रहेगी l बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर 1875 ई. को छोटानागपुर के एक छोटे से गाँव उलीहातू में हुआ l इनके माता का नाम करमी हातू और पिता का नाम सुगना मुंडा था l उनकी शिक्षा-दीक्षा सलगा में हुई l चाइबासा में 1886 ई. से 1890 ई. का छोटा प्रवास उनके जीवन का महत्वपूर्ण निमार्ण काल साबित हुआ l विदेशियों ने आदिम जाति विरोधी व्यवहार किया इसकी पहचान कर वे तुरंत बन्द्गाँव चले गए l यहाँ वे वैष्णव संप्रदाय से काफी प्रभावित हुए l कृषि की स्थिति एवं इस व्यवसाय से जुड़े लोगों की दयनीय स्थिति से बिरसा मुंडा की मानसिकता में जमींदार विरोधी भावना क्रमशः बढती गई l इस कारण वे आदिवासियों में लोकप्रिय होने लगे l इन आदिम जातियों को राजनितिक एवं सामाजिक रूप से सबल बनाने के लिए एक नई जीवन शैली एवं शिक्षा की शुरुआत बिरसा ने चलकंद गाँव से प्रारंभ की l इससे हजारों लोग उनके गुट में शामिल हो गए l अब लोग उन्हें ‘धरती आबा’ के नाम से जानने लगे l


अंग्रेजों ने ‘इंडियन फारेस्ट एक्ट 1882’ पारित कर आदिवासियों को जंगल के अधिकार से वंचित कर दिया l अंग्रेजों ने ज़मींदारी व्यवस्था लागू कर आदिवासियों के वो गाँव, जहाँ वे सामूहिक खेती करते थे, ज़मींदारों और दलालों में बांटकर राजस्व की नयी व्यवस्था लागू कर दी, और फिर अंग्रेजों, ज़मींदारों और महाजनों द्वारा भोले-भाले आदिवासियों का शोषण शुरू हो गया l बिरसा ने इस शोषण के खिलाफ विद्रोह की चिंगारी फूंकीl अपने लोगों को गुलामी से आज़ादी दिलाने के लिए बिरसा ने ‘उलगुलान’ की अलख जगाई l

1895 ई. में अंग्रेजों की लागू की गयी ‘ज़मींदारी प्रथा और राजस्व व्यवस्था’ के खिलाफ लड़ाई के साथ-साथ जंगल-ज़मीन की लड़ाई छेड़ी l यह बगावत आदिवासी स्वाभिमान, स्वतंत्रता और संस्कृति को बचाने का संग्राम था l

बिरसा ने ‘अबुआ दिशुम अबुआ राज’ यानी ‘हमारा देश, हमारा राज’ का नारा दिया l देखते-ही-देखते सभी आदिवासी, जंगल पर दावेदारी के लिए इकट्ठे हो गए l अंग्रेजी सरकार के पाँव उखड़ने लगे और भ्रष्ट ज़मींदार और पूंजीवादी बिरसा के नाम से कांपने लगे l

अंग्रेजी सरकार ने बिरसा के उलगुलान को दबाने का हर संभव प्रयास किया, लेकिन आदिवासियों के गुरिल्ला युद्ध के आगे उन्हें असफलता ही मिली l 1897-1900 ई. के बीच कई लड़ाइयाँ हुई लेकिन अंग्रेजों को पराजय ही हाथ लगी l

जिस बिरसा को अग्रेजों की तोप और बंदूकों की ताकत नहीं पकड़ पाई, उसके बंदी बनने का कारण अपने ही लोग बने l किसी की मुखबिरी पर अंग्रेजों ने जनवरी 1900 ई. में एक जनसभा को संबोधित करते हुए चक्रधरपुर में उन्हें गिरफ्तार कर लिया l 9 जून 1900 ई. को बिरसा मुंडा ने राँची के कारागार में अंतिम साँस ली l आज भी बिहार, उड़ीसा, झारखंड, छतीसगढ़ और पश्चिम बंगाल के आदिवासी इलाकों में बिरसा मुंडा को भगवान् की तरह पूजा जाता है l इनकी समाधी राँची में कोकर के निकट डिस्टलरी पुल के पास स्थित है l उनकी स्मृति में राँची में बिरसा मुंडा केन्द्रीय कारागार तथा बिरसा मुंडा हवाई-अड्डा भी है l

बिरसा के जाने के इतने सालों बाद आज भी उनका संग्राम जारी है l बहुत से आदिवासी संगठन हैं जो जंगले पर दावेदारी के लिए आज भी संघर्ष कर रहे हैं l इन सभी ने मिलकर बिरसा का उलगुलान जारी रखा है l हिंदी साहित्य की महान लेखिका और उपन्यासकार महाश्वेता देवी ने अपने उपन्यास ‘जंगल के दावेदार’ में बिरसा मुंडा के जीवन और आदिवासी स्वाभिमान के लिए उनके संघर्ष को मार्मिक रूप से लिखा है l


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