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CLASS XII : HINDI ELECTIVE


देवसेना का गीत

प्रश्नोत्तर



प्रश्न 1- “मैने भ्रमवश जीवन संचित, मधुकरियों की भीख लुटाई” – पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- प्रस्तुत पंक्ति में देवसेना की वेदना का परिचय मिलता है। वह स्कंदगुप्त से प्रेम कर बैठती है परन्तु स्कंदगुप्त के हृदय में उसके लिए कोई स्थान नहीं है। जब देवसेना को इस सत्य का पता चलता है, तो उसे बहुत दुख होता है। वह स्कंदगुप्त को छोड़कर चली जाती है। उन्हीं बीते पलों को याद करते हुए वह कह उठती है कि मैंने प्रेम के भ्रम में अपनी जीवन भर की अभिलाषाओं रूपी भिक्षा को लुटा दिया है। अब मेरे पास अभिलाषाएँ बची ही नहीं है। अर्थात् अभिलाषाओं के होने से मनुष्य के जीवन में उत्साह और प्रेम का संचार होता है, परन्तु आज उसके पास ये शेष नहीं रहे हैं।


प्रश्न 2- कवि ने आशा को बावली क्यों कहा है? उत्तर- 'आशा' बहुत बलवती होती है परन्तु इसके साथ ही वह बावली भी होती है। आशा यदि डूबे हुए को सहारा देती है, तो उसे बावला भी कर देती है। प्रेम में तो आशा बहुत अधिक बावली होती है। वह जिसे प्रेम करता है, उसके प्रति हज़ारों सपने बुनता है। फिर उसका प्रेमी उसे प्रेम करे या न करे। वह आशा के सहारे सपनों में तैरता रहता है। यही कारण है कि आशा बावली होती है।

जीवन के अंतिम क्षण में जब स्कंदगुप्त देवसेना से आकर प्रेम का इज़हार करता है तब देवसेना सोचती है कि जीवन में जब उसे स्कंदगुप्त की जरूरत थी उस समय तो उसने स्कंदगुप्त ने निवेदन अस्वीकार कर दिया पर अब जब वो अपना जीवन देश प्रेम में लगा चुकी है, स्कंदगुप्त वापस आ रहे है वह इस समय अपनी आशा को बावली कहकर उन्हें चुप करती है कि आशा तुम क्यों बावली हुई जा रही हो मैं अपना कर्तव्य नहीं छोड़ सकती अगर मैने ऐसा किया तो मेरा अब तक की त्याग और तपस्या भंग हो जाएगी उसका प्रण उसकी निष्ठा उसके लिए सबसे ऊपर है। प्रश्न 3- “मैने निज दुर्बल पद – बल पर, उससे हारी – होड़ लगाई” इन पंक्तियों में ‘दुर्बल पद बल’ और ‘ हारी होड़ ‘ में निहित व्यंजना स्पष्ट कीजिए –

उत्तर- 'दुर्बल पद बल' देवसेना के बल की सीमा का ज्ञान कराता है। अर्थात देवसेना अपने बल की सीमा को बहुत भली प्रकार से जानती है। उसे पता है कि वह बहुत दुर्बल है। इसके बाद भी वह अपने भाग्य से लड़ रही है। देवसेना को आजीवन विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ा जब उसके परिवार पर आक्रमण हुआ तो उसके भाई समेत पूरा परिवार वीरगति को प्राप्त हुआ तब वह अकेली पड़ गई उसका कोई सहारा नहीं था l उसके आगे मात्र एक ही रास्ता था कि वो देश सेवा को अपना ले क्योंकि स्कंदगुप्त भी उसे ठुकरा चुके थे।

इसलिए वह अपनी विपरीत परिस्थितियों के साथ जीने लगी और परिस्थितियाँ इतनी प्रबल थी को वह उनके आगे हार गई उसने परिस्थितियों से लड़ने के लिए जो होड़ लगाए यहाँ उसकी बात की गई है अर्थात परिस्थितियों से उसने मुकाबला किया लेकिन वो जीत नहीं पाई l 'होड़ लगाई' पंक्ति में निहित व्यंजना देवसेना की लगन को दर्शाता है। देवसेना भली प्रकार से जानती है कि प्रेम में उसे हार ही प्राप्त होगी परन्तु इसके बाद भी पूरी लगन के साथ प्रलय (हार) का सामना करती है। वह हार नहीं मानती।

प्रश्न 4- काव्य सौंदर्य स्पष्ट कीजिए (क) श्रमित स्वप्न की मधुमाया में, गहन–विपिन की तरु–छाया में, पथिक उंनींदी श्रुति में किसने- यह विहाग की तान उठाई।

उत्तर-

भाव सौंदर्य- इन पंक्तियों का भाव ये है कि जिस प्रकार घने जंगल में पथिक थका हारा आए और पेड़ो की छाँव में सो रहा हो और उस समय कोई तान सुना दे जाए तो वह उसे अच्छा नहीं लगेगा। उसी प्रकार से देवसेना अपनी मीठी यादें और उसने जो सपने देखे थे स्कंदगुप्त को पाने के उनसे वह हार गई और अब वह देश सेवा के लिए समर्पित हो गईl यहाँ वह अपने आप को पथिक के रूप में अभिव्यक्त करती है और कहती है कि अब उसे स्कन्द गुप्त का प्रेम निवेदन अच्छा नहीं लग रहा।

इस काव्यांश की विशेषता है कि इसमें स्मृति बिंब बिखरा पड़ा है। देवसेना स्मृति में डूबी हुई है। उसे वे दिन स्मरण हो आते हैं, जब उसने प्रेम को पाने के लिए अथक प्रयास किए थे परन्तु वह असफल रही। अब उसे अचानक उसी प्रेम का स्वर सुनाई पड़ रहा है। यह उसे चौंका देता है। विहाग राग का उल्लेख किया गया है। इसे आधी राती में गाया जाता है। स्वप्न को कवि ने श्रम रूप में कहकर गहरी व्यंजना व्यक्त की है। स्वप्न को मानवी रूप में दर्शाया है। शिल्प सौंदर्य – 1. खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है। 2. तत्सम प्रधान है। 3. संगीतत्मक्ता है। 4. मधुर गुण है। 5. वियोग श्रृंगार एवं करुण रस है। (ख) लौटा लो यह अपनी थाती , मेरी करुणा हा – हा खाती। विश्व ! न सँभलेगा यह मुझसे, इससे मन की लाज गंवाई।

भाव सौंदर्य- इन पंक्तियों का भाव ये है कि देवसेना कहती है कि हे स्कंदगुप्त तुम अब अपनी वो धरोहर अर्थात lतुम्हें पाने की वो मधुर कल्पनाएँ मुझसे वापिस ले लो जो मैंने तुम्हारे याद में संजोई थी l वह सब तुम मुझसे वापिस ले लो क्योंकि अब मेरा हृदय इनको और संभाल नहीं पा रहा है। मेरी करुणा भी थक हार चुकी है और मैने अपने मन की लाज भी गँवा दी है।

इस काव्यांश की विशेषता है कि इसमें देवसेना की निराशा से युक्त हतोत्साहित मनोस्थिति का पता चलता है। स्कंदगुप्त का प्रेम वेदना बनकर उसे प्रताड़ित कर रहा है।

शिल्प सौंदर्य – 1. मानवीकरण किया गया है 2. करुण रस है 3. वियोग श्रृंगार है 4. लाज गवाना मुहावरे का प्रयोग है 5. तत्सम शब्द व खड़ी बोली का प्रयोग किया है।


प्रश्न 5- देवसेना की हार या निराशा के क्या कारण हैं?

उत्तर- देवसेना महाराजा बंदू वर्मा की बहन है उसका सारा परिवार वीरगति को प्राप्त होता है l अपने विवाह के स्वप्न को साकार करने के लिए वह स्कंदगुप्त के शरण में जाती है पर वो धन कुबेर की कन्या विजया से प्रेम करता है और वह देवसेना के प्रेम को अस्वीकार कर देता है।

देवसेना का जीवन संकटों से भरा है किन्तु वह जीवन की विपरीत परिस्थितियों में जीती है, उनसे होड़ भी लगाती है किन्तु वह हार जाती है क्योंकि विपरीत परिस्थितियाँ इतनी प्रबल है कि उसके जीवन में निराशा व्याप्त हो जाती है। सम्राट स्कंदगुप्त से राजकुमारी देवसेना प्रेम करती थी। उसने अपने प्रेम को पाने के लिए बहुत प्रयास किए। परन्तु उसे पाने में उसके सारे प्रयास असफल सिद्ध हुए। यह उसके लिए घोर निराशा का कारण था। वह इस संसार में बंधु-बांधवों रहित हो गई थी। पिता पहले ही मृत्यु की गोद में समा चुके थे तथा भाई भी युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुआ था। वह दर-दर भिक्षा माँगकर गुजरा कर रही थी। उसे प्रेम का ही सहारा था। परन्तु उसने भी उसे स्वीकार नहीं किया था। यही देवसेना के निराशा का कारण रहा l

निरुपमा कुमारी, राम रूद्र +2 उच्च विद्यालय चास, बोकारो

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